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    मनमानी फीस वसूलने से भड़के पेरेंट्स उतरे सड़कों पर

    दिल्ली : प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ इन दिनों पैरंट्स सड़कों पर उतर आए हैं। दो साल बाद स्कूल पूरी तरह से खुले हैं और पैरंट्स का कहना है कि कुछ स्कूल मनमानी फीस मांग रहे है, कुछ रिजल्ट रोक रहे हैं, कुछ स्टूडेंट्स को नई क्लास में नहीं जाने दे रहे। शिक्षा निदेशालय एक अधिकारी ने बताया कि नए सेशन से स्कूलों को फीस बढ़ाने की इजाजत नहीं दी गई है। जो भी शिकायतें मिली हैं उनकी जांच होगी। वहीं, पिछले सेशन के लिए पुराना ऑर्डर लागू होगा।

    1 जुलाई को शिक्षा निदेशालय ने आदेश जारी कर कहा था कि स्कूल डिवपलमेंट चार्ज, एनुअल चार्ज और ट्यूशन फीस तीनों में 15% की छूट पैरंट्स को दें। यह व्यवस्था 2020-21 के साथ साथ 2021-22 के लिए लागू करने को कहा गया था। मगर पैरंट्स का कहना है कि स्कूल इस आदेश को नहीं मान रहे हैं, उलटा फीस बढ़ा दी गई है। कई स्कूलों का कहना है कि कुछ स्कूल ट्यूशन फीस में रिबेट नहीं दे रहे हैं। डीपीएस द्वारका में हुए प्रदर्शन के एक दिन बाद बुधवार को डीपीएस रोहिणी के आगे भी पैरंट्स ने प्रदर्शन किया है। उनका कहना है कि स्कूल ने फीस तक 28% बढ़ा दी है। बाल भारती स्कूल, सेंट थॉमस स्कूल समेत कुछ और स्कूलों के आगे भी प्रदर्शन हो चुके हैं।

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    15% छूट ट्यूशन फीस में भी
    शिक्षा निदेशालय ने साफ कहा है कि 460 स्कूलों को एनअुल, डिवपलमेंट और ट्यूशन फीस में 15% छूट देनी होगी और बाकी स्कूलों में 18 अप्रैल 2020 और 28 अगस्त 2018 में फीस संबंधी जारी किए गए निर्देश का पालन किया जाएगा यानी जो आखिरी मंजूर फीस स्ट्रक्चर है, उसी के हिसाब से लेगा। ‘जस्टिस फॉर ऑल’ एनजीओ के प्रेजिडेंट खगेश झा कहते हैं, स्कूल वाले मनमानी कर रहे हैं। दरअसल लॉकडाउन में दिल्ली सरकार ने एनुअल और डिवपलमेंट फीस ना लेने का आदेश दिया था। बाद में हाई कोर्ट ने कहा कि वे एनुअल और डिवपलमेंट फीस ले सकते हैं मगर 15% छूट देनी होगी। हालांकि, सरकार ने जो नोटिफिकेशन निकाला उसमें एनुअल, डिवपलमेंट के साथ साथ ट्यूशन फीस में भी 15% छूट देने को कहा। इसे स्कूलों ने कोर्ट में चुनौती दी मगर कोर्ट ने स्टे नहीं दिया, यानी सरकार का नोटिफिकेशन पिछले दोनों सेशन के लिए माना जाएगा। मगर कुछ स्कूलों ने उस वक्त भी फीस बढ़ाई, ना रिबेट दिया और नए सेशन में वे पुराने ड्यूज मांग रहे हैं।

    दो तरह के स्कूल, दो नियम
    दिल्ली में दो तरह के स्कूल हैं – एक सरकारी जमीन पर बने और दूसरे प्राइवेट जमीन पर बने। इनके लिए अलग अलग नियम भी पैरंट्स को उलझन में डाल रहे हैं। दिल्ली सरकार का कहना है कि डीडीए लैंड पर बने सभी स्कूल फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय से इजाजत लेनी होगी मगर दिल्ली स्टेट पब्लिक स्कूल मैनेजमेंट असोसिएशन के प्रेजिडेंट आर सी जैन कहते हैं, मगर ऐसे करीब 400 स्कूलों की लिस्ट में से सिर्फ 190 स्कूल हैं, जिसके डॉक्युमेंट्स में पूर्व मंजूरी की शर्त लिखी गई है। डीडीए लैंड पर बने बाकी स्कूलों और प्राइवेट लैंड वाले स्कूलों के लिए पूर्व मंजूरी की शर्त लागू नहीं होती। दिल्ली स्कूल एजुकेशन एक्ट एंड रूल्स का नियम 17-3 भी कहता है कि किसी भी स्कूल को फीस बढ़ाने के लिए मैनेजमेंट कमिटी में प्रस्ताव पारित करना होगा और शिक्षा विभाग को जानकारी देनी होगी। विभाग को अगर लगता है कि बेवजह फीस बढ़ाई जा रही है तो वो रोक सकता है। जैन कहते हैं, इस वक्त फीस बढ़ाना कई स्कूलों के लिए जरूरी है क्योंकि 2015-16 से सरकार ने इजाजत नहीं दी है। स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा है, टीचर्स को सैलरी देनी है, यह सभी खर्च इसी से आएंगे। हमारी 25% फ्री सीटें EWS के लिए हैं मगर सरकार इसका रीइम्बर्स्मन्ट या तो नहीं देती या बहुत देरी से देती है। अनएडेड प्राइवेट स्कूल्स की एक्शन कमिटी के जनरल सेक्रेटरी भरत अरोड़ा का कहना है, एनुअल और डिवपलमेंट फीस का मामला अभी कोर्ट में है, जिसकी सुनवाई 13 जुलाई को होगी और नए सेशन में हमारी जानकारी में किसी स्कूल ने फीस नहीं बढ़ाई है।

    पैरंट्स भी करवा सकते हैं स्कूल का ऑडिट
    खगेश झा कहते हैं, नियम अलग अलग है मगर ऑडिट हर स्कूल का होगा, चाहे उसमें शिक्षा विभाग से फीस बढ़ाने के लिए पहले मंजूरी ली हो या फिर फीस बढ़ाकर जानकारी दी हो। पैरंट्स को यह जानना जरूरी है कि अगर उन्हें लगता है कि स्कूल ने गलत तरीके से फीस बढ़ाई तो वो स्कूल का ऑडिट करवा सकते हैं। इसके लिए उन्हें को शिक्षा निदेशालय के डिस्ट्रिक्ट ऑफिस जाकर फीस एनॉमली कमिटी का 100 रुपये फॉर्म भरना होगा। इसके तहत स्कूल का ऑडिट 90 दिन के अंदर सरकार को करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रावधान बनाया है।

    ‘पैरंट्स को नहीं दी गई है स्कूल की हर जानकारी’
    दिल्ली पैरंट्स असोसिएशन की प्रेजिडेंट अपराजिता गौतम कहती हैं, पैरंट्स को जानकारी नहीं है कि उनके स्कूल में किस फीस स्ट्रक्चर को शिक्षा विभाग ने मंजूरी दी है। उन्हें यह नहीं पता कि उनका स्कूल किस कैटेगरी का है। हम इतने सालों से शिक्षा विभाग को कह रहे हैं कि वो यह सारी जानकरी अपनी वेबसाइट में डाले और बताए कि किस स्कूल का ऑडिट हुआ है, किसका नहीं और किसके पास सरप्लस अमाउंट है। अभी निदेशालय सिर्फ बेसिक जानकारी दे रहा है। हर जानकारी अगर पोर्टल पर होगी तो उन्हें आसानी होगी और वे अपनी पॉकेट के हिसाब से स्कूल भी चुन सकेंगे। मगर पैरंट्स को तो उलझाया जा रहा है और शिक्षा बिजनेस बन रहा है।

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