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कान छिदवाने से होने वाले घाव की ऐसे करें देखभाल

आभूषण हमेशा से श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। एक समय वह भी था जब महिलाएं केवल फूलों या लकड़ी, पत्थर आदि जैसे प्राकृतिक संसाधनों से बने गहने पहना करती थीं। फिर धीरे धीरे इनकी जगह कीमती धातुओं जैसे सोना, चांदी आदि ने लेना शुरु किया। समय के साथ आभूषणों को पहनने का तरीका और पसंद में भी बदलाव आया। नाक-कान छिदवाना या पियर्सिंग करवाना एक सामान्य प्रक्रिया रही है। यह नवजात शिशुओं के एक संस्कार के रूप में भी अपनाया जाता है और शौकिया रूप में स्त्री-पुरुष दोनों वयस्कों द्वारा भी। कई बार कान की पियर्सिंग करवाने के बाद एक छोटा घाव सा बन जाता है जिसके लिए ज्यादातर गर्म तेल और हल्दी लगाने की सलाह दी जाती है, लेकिन पर्याप्त ध्यान न दिए जाने पर यह घाव गंभीर रूप भी ले सकता है।

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स्किन का अधिक संवेदनशील होना, शरीर में किसी प्रकार की समस्या का मौजूद होना जिसकी वजह से घाव को ठीक होने में समय लगे या किसी प्रकार के संक्रमण की चपेट में आ जाना, ये वे कुछ कारण हैं जो कान के इस घाव को और खराब कर सकते हैं।

शरीर की सामान्य प्रक्रिया

आमतौर पर जब हमारे शरीर में कहीं भी कोई कट या चोट लगती है तो शरीर खुद से ही घाव को भरने की प्रक्रिया शुरू कर देता है। शरीर जितना स्वस्थ होगा, यह प्रक्रिया उतनी ही तेज होगी। जब कान की नाजुक त्वचा को किसी मशीन या अन्य साधन की मदद से पंक्चर किया जाता है तो यह भी एक तरह का घाव बन जाता है। अब अगर आप कान की लौ यानी सबसे नरम, निचले हिस्से पर पियर्सिंग करवा रहे हैं तो दिक्कत उतनी नहीं होती लेकिन अगर कान की थोड़ी हार्ड वाली जगह जिसे पिन्ना कहा जाता है, उस पर दो-तीन जगह पियर्सिंग करवा रहे हैं तो इसे ठीक होने में समय लग सकता है। यहां चमड़ी कड़क होने और हड्डी के होने से दर्द भी ज्यादा हो सकता है। इसलिए इस जगह पर इंफेक्शन का खतरा भी अधिक होता है। कई बार तो कान छिदवाने के कई दिनों बाद, जब ऐसा लगता है कि घाव सूख रहा है, तब संक्रमण के लक्षण उभर सकते हैं। इस समय तुरंत उपचार करना जरूरी होता है।

दर्द से लेकर पस पड़ने तक 

कान छिदवाने के बाद कई लोगों को उस जगह पर या उसके आस पास एक उभार सा नजर आता है जिसे आम बोलचाल में मसूरी या फुंसी भी कहते हैं। यह असल में त्वचा के भीतर द्रव्य भर जाने से पैदा होती है और इसे ग्रेन्युलोमा कहा जाता है। इसके अलावा त्वचा पर लाली आना, दर्द होना, खुजली, जलन, पस पड़ जाना आदि लक्षण सामने आ सकते हैं। इन लक्षणों के उभरते ही तुरंत उपचार जरूरी है। ज्यादातर घरेलू उपचार से आराम मिलना शुरू हो सकता है। आमतौर पर सामान्य संक्रमण दो से ढाई हफ्तों के भीतर ठीक हो जाता है लेकिन यदि दो-तीन दिनों में आराम न हो तो तुरंत प्रोफेशनल मदद लेना जरूरी है, वरना संक्रमण बढ़कर अधिक गंभीर रूप ले सकता है।

घरेलू उपचार और आराम 

सामान्यतौर पर कान छिदवाने के बाद देशी इलाज के तौर पर हल्दी और गरम तेल का उपयोग किया जाता है। इससे दर्द में भी राहत मिलती है और घाव के ठीक होने की प्रक्रिया भी इससे तेज होती है। इसके अलावा कुछ लोग सॉल्ट वाटर यानी गुनगुने पानी में थोड़ा सा नमक मिलाकर भी घाव को साफ़ करते हैं। लेकिन यह अधिक पीड़ादायक हो सकता है। इसलिए इसके उपयोग को संभलकर करें। यदि घाव ज्यादा तकलीफ नहीं देता तो उसपर नारियल तेल लगाने से भी आराम मिल सकता है। हल्दी और नारियल तेल दोनों ही गुणकारी होते हैं। हल्दी में मौजूद करक्यूमिन में एंटीऑक्सीडेंट्स व एंटीइंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। इसके साथ ही यह शरीर पर बाहरी तत्वों के हमलों को रोकने और चोट या घाव को रिपेयर करने में भी मददगार होता है। इसी तरह नारियल तेल में कुछ प्रकार के बैक्टीरिया को पनपने से रोकने का गुण होता है, साथ ही यह त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसलिए संक्रमण को रोकने से लेकर चोट को ठीक करने तक में मदद करता है।

ऑइंटमेंट लगाएं 

घाव साफ़ करने के बाद उस पर कोई भी एंटीबैक्टीरियल ऑइंटमेंट लगाकर रुई से कवर करके रखें। यह घाव को सूखने और संक्रमण से बचाने में मदद करेगा। यदि आप ऑइंटमेंट को लेकर असमंजस में हैं तो डॉक्टर से सलाह लें क्योंकि कुछ लोगों को सभी ऑइंटमेंट सूट नहीं होते। इंफेक्शन जब तक ठीक न हो या घाव सूख न जाए तब तक घाव को साफ़ करके दिन में कम से कम दो-तीन बार ऑइंटमेंट लगाकर रुई लगाएं।
घरेलू उपचार से सामान्यतः 2-3 हफ्तों में पूरी तरह आराम मिल सकता है। यदि आप घाव की शुरुआत से ही देखभाल करें और हाइजीन का पूरा ध्यान रखें तो। संक्रमण का बढ़ना या ठीक न होना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर में और भी कोई स्थिति मौजूद है जो घाव भरने की सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया में बाधा डाल रही है।

हाइजीन का रखें ख्याल 

शायद यह बात आपको छोटी लगे लेकिन संक्रमण का एक बड़ा कारण साफ़-सफाई न रखना भी है। खासकर जब आप बार बार कान की पिर्यसिंग वाली जगह पर हाथ लगाते हों। कोरोना के दौर में तो यह बात सबसे अधिक समझाई जाती रही है कि हाथों को अच्छी तरह धोने और साफ़ रखने की कितनी जरूरत है। हाथों के रास्ते संक्रमण फ़ैलाने वाले तत्व आसानी से शरीर के भीतर तक पहुंच सकते हैं और पियर्सिंग वाले मामले में भी यही बात लागू होती है। इसलिए जितनी बार आप इयररिंग को घुमाने, ऑइंटमेंट लगाने आदि के लिए हाथ पियर्सिंग वाली जगह पर ले जाएँ, आपके हाथ अच्छी तरह धुले और साफ़ होने चाहिये। इसी तरह पियर्सिंग वाली जगह को साफ़ करने के लिए भी साफ़ कॉटन का कपड़ा या रुई का उपयोग करें। ऐसा न होने पर घाव ठीक होने की संक्रमण बढ़ भी सकता है।

डॉक्टर से सलाह लें अगर 

घरेलू उपायों से आराम न मिले, इयररिंग या कान में पहना आभूषण एलर्जी के लक्षण दिखाने लगे या वह घाव के बीच में फंस जाए, घाव में पस पड़ने लगे या सूजन न जाए तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। कई मामलों में संक्रमण ठीक न होने पर त्वचा या खुले घाव के रास्ते शरीर के भीतर भी पहुंच जाता है और यह स्थिति न केवल गंभीर होती है बल्कि लम्बा इलाज भी मांगती है। डॉक्टर आपको घाव सुखाने वाली दवाई दे सकते हैं या ऑइंटमेंट बदल कर दे सकते हैं। अक्सर डॉक्टर्स या विशेषज्ञ पियर्सिंग वाली जगह पर अल्कोहल वाला कोई द्रव्य, एंटीबायोटिक ऑइंटमेंट या हायड्रोजन पैरॉक्साइड आदि लगाने से मना करते हैं क्योंकि इनसे त्वचा के रूखे होने की आशंका होती है। शुष्क त्वचा समस्या को बढ़ा सकती है और घाव के ठीक होने में रुकावट पैदा कर सकती है।

मैटल से एलर्जी, कान से एकदम चिपके हुए इयररिंग आदि भी संक्रमण को निमंत्रण दे सकते हैं। इसी तरह पियर्सिंग के तुरंत बाद जल्दी जल्दी इयररिंग को बदलना भी मुश्किल खड़ी कर सकता है। कई बार संक्रमण शुरू होने के बाद यदि आप इयररिंग बाहर निकाल देते हैं तो कान में करवाया गया छेद भर जाता है लेकिन संक्रमण उसके भीतर ही रह जाता है और तकलीफ बढ़ा देता है। यह भी याद रखें कि पियर्सिंग हमेशा प्रशिक्षित व्यक्ति और सही जगह से करवाएं। यदि कार्टिलेज यानी कान की कठोर वाली जगह पर छेद करवा रहे हैं तो पियर्सिंग गन की तुलना में निडिल का प्रयोग ज्यादा अच्छा रहेगा।

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