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रेटिंग एजेंसी फिच ने चालू वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर घटाई

रेटिंग एजेंसी फिच ने चालू वित्त वर्ष 202-23 में देश की आर्थिक वृद्धि दर का पूर्वानुमान घटा दिया है। गुरुवार को कंपनी ने दावा किया कि चालू वित्त वर्ष की जीडीपी वृद्धि दर 7 फीसदी रहेगी। पहले उसने यह 7.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया था।

अग्रणी रेटिंग एजेंसी फिच ने जून में जारी पूर्वानुमान में जीडीपी दर 7.8 फीसदी रहने की उम्मीद जताई थी। अब उसका कहना है कि चालू वर्ष में यह 7 फीसदी रहेगी। यानी इसमें 0.8 फीसदी की कमी की गई है। इतना ही नहीं फिच ने अगले वित्त वर्ष (2023-24) के लिए भी अपना जीडीपी पूर्वानुमान घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया है। पहले उसने यह 7.4 फीसदी रहने की उम्मीद जताई थी।

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बढ़ेंगी ब्याज दरें, 5.9 तक जाएंगी
फिच का अनुमान है कि रिजर्व बैक महंगाई घटाने पर लक्ष्य केंद्रित करते हुए ब्याज दर लगातार बढ़ा सकता है। इस साल के अंत तक ये 5.9 फीसदी तक पहुंच सकती है। हालांकि यह आर्थिक गतिविधियों की स्थिति और महंगाई के हालात को देखते हुए ही किया जाएगा।

वैश्विक जीडीपी 2.4 फीसदी रहने का अनुमान
फिच ने विश्व की जीडीपी दर 2022 में 2.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। जून के अनुमान की तुलना में उसने इसमें 0.5 फीसदी की कमी की है। इसी तरह 2023 में वैश्विक जीडीपी दर 1.7 फीसदी रहने का अनुमान है। यूरो जोन और ब्रिटेन में इस साल के अंत तक और अमेरिका में अगले साल हल्की मंदी आ सकती है।

पूर्व गवर्नर सुब्बाराव ने जताई थी चिंता
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने बीते दिनों कहा था कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था में बड़ी छलांग की उम्मीद थी, लेकिन आर्थिक वृद्धि दर का उम्मीद से कम रहना निराशा और चिंताजनक है। 2022-23 की जून तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 13.5 फीसदी रही। उन्हें चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर के 13.5 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान था। मौजूदा परिस्थितियों में यह निराशा और चिंता का कारण बन गया है।

आगे और चुनौतीपूर्ण होंगे हालात
सुब्बाराव ने कहा था कि आगे की तिमाहियों में वृद्धि दर में और गिरावट की आशंका है। अल्पावधि में वृद्धि दर कमोडिटी की उच्च कीमतों, वैश्विक मंदी की आशंका, आरबीआई की सख्त मौद्रिक नीति से प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा था कि अगले 4-5 साल में 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए विकास दर लगातार 8.9 फीसदी होनी चाहिए। निजी निवेश कुछ वर्षों से रफ्तार नहीं पकड़ रहा है। निर्यात भी वैश्विक मंदी के कारण कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहा है। राजकोषीय बाधाओं की वजह से सार्वजनिक निवेश को चुनौती मिल रही है।

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