Homeलाइफस्टाइल"सूरज सा दमको तुम, मत चंदा सा चमको तुम"

“सूरज सा दमको तुम, मत चंदा सा चमको तुम”

मानव का स्वभाव है कि वह अपने जीवन में उन्नति के शिखर पर पहुंचना चाहता है। विचित्र बात यह है कि उन्नति अथवा सफलता का शिखर भी सबको अलग-अलग ऊंचाइयों पर दिखता है। सभी के लिए उसके मायने अपने-अपने दृष्टिकोण से निर्धारित होते हैं। परंतु एक प्रवृत्ति जो सभी में विद्यमान है, वो यह कि सब के सब अधिकाधिक उन्नति एवं प्रगति करना चाहते हैं तथा सामाजिक पटल पर अपनी एक अलग पहचान  प्रक्षेपित करना चाहते हैं । यदि बात पहचान की करें,  तो उसको प्राप्त करने के भी दो मार्ग हैं। एक तो स्वयं के अथक परिश्रम से हीरे की तरह चमकना और दूसरा कुछ विशिष्ट, तथाकथित बड़े लोगों की चरण वंदना करके उनके आशीर्वाद व कृपा के तेज से स्वयं को प्रकाशित करना। पहला मार्ग अर्थात परिश्रम की नौका पर सवार होकर आगे बढ़ना एक बेहद कठिन साधना है।

 

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इस तपस्या में धैर्य व सहनशीलता का होना नितांत अपरिहार्य है। धैर्य व सहनशीलता ऐसे गुण हैं जो अब शनैः शनैः मानव के व्यक्तित्व से विलुप्त होते जा रहे हैं। इनके अभाव में परिश्रम की नौका नहीं चल सकती क्योंकि परिश्रम का मार्ग एक अति पवित्र किंतु लंबा मार्ग है। परंतु फिर भी, कुछ ऐसे व्यक्ति जो तन व मन से सच्चे एवं कपटरहित हैं, आज भी इसी मार्ग को अपनाकर समाज, राष्ट्र एवं विश्व स्तर तक भी अपनी पहचान को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यक्ति जो पूर्णतया अकर्मण्यता से ओतप्रोत हैं, वे साधना का दूसरा मार्ग पकड़ते हैं । वे कहीं ना कहीं, किसी न किसी रूप में अपना आराध्य ढूंढ लेते हैं, जिसको वे ईश्वर का प्रतिबिंब मानकर उसके प्रति पूर्ण समर्पण दर्शाते हुए, उसकी कृपावृष्टि की फुहारों से स्वयं को भिगोने का प्रयास करते हैं। इनके ये आराध्य देव भी पुराने समय के अकर्मण्य लोग ही होते हैं , जो चाटुकारिता के सागर में गोते लगाकर धीरे-धीरे आराध्य का रूप ले चुके होते हैं।

 

 

यदि हम सूर्य व चंद्रमा की बात करें, तो सूर्य के पास अपनी स्वयं की ऊर्जा है, जिसके बल पर वह स्वयं दीप्तमान होता है एवं अन्य आकाशीय पिंडों को भी ऊर्जा देता है। इसके विपरीत चन्द्रमा, चमकने के लिए पूर्णतया सूर्य पर आश्रित है। जब भी सूर्य का प्रकाश उस पर आपतित नहीं हो पाता,  वह हमें आकाश में कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होता । हमें भी अपना व्यक्तित्व इस तरह से निर्मित करना चाहिए कि हमें समाज व राष्ट्र में अपनी पहचान हेतु  किसी अन्य पर निर्भर न होना पड़े।

 

जब हम स्वयं में अंतर्निहित क्षमता का सहारा लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो हम प्रतिक्षण आत्मसंतुष्टि एवं आत्मविश्वास से भी लबरेज रहते हैं। विपरीततः यदि हम किसी की चाटुकारिता की बैसाखी पकड़कर स्वयं को आगे ले जाने का प्रयास करते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यही है कि हम अपने शरीर एवं मस्तिष्क को अपंग व निष्क्रिय करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

शिशिर शुक्ला

 

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